गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

असमंझस : खेती पर दाँव  


किसान  समझ  नहीं पा  रहा,
क्या दांव  सरकार  ने खेल दिया, 
न्यूनतम समर्थन  मूल्य  का भी, 
भविष्य ताक में  रख दिया 11 

भण्डारण  की सीमा  बढ़ाकर, 
वह  किसान  भण्डारण  क्या  कर पाएगा,
बारिश  में  टपकती  छतों  में  वह कहाँ, 
गेंहू ,धान  सहेजकर  रख  पायेगा 11 

कॉन्ट्रैक्ट  खेती का करार कहीं,
 कागज़ी दस्तावेज़  बनकर तो नहीं रह जायेगा, 
यही  सोचकर  घबराता  किसान कहीं, 
फिर  हाशिए  पर तो नहीं आ जायेगा 11 
















































































































सोमवार, 14 सितंबर 2020

KALPANAKRITI: सांझ उस सांझ की मद्धम धूप  में,  एक सुकून दिखाई द...

KALPANAKRITI: सांझ 
उस सांझ की मद्धम धूप  में,  एक सुकून दिखाई द...
: सांझ  उस सांझ की मद्धम धूप  में,  एक सुकून दिखाई देता  है  शांत सांझ से मिल जाऊ, तो नया शोर सुनाई देता है  दफ्तरों  कि लालफ़ीताशाही में ,सांझ...

सांझ 


उस सांझ की मद्धम धूप  में,  एक सुकून दिखाई देता  है 

शांत सांझ से मिल जाऊ, तो नया शोर सुनाई देता है 

दफ्तरों  कि लालफ़ीताशाही में ,सांझ कहीं  बेदाग़ सा लगता है 

तंग लिबास पहने लोगो को ,सांझ में दो पल फुरसत सा लगता है 



सांझ अपने अंदर दिन और रात  का सामंजस्य बनाये रहता है 

सांझ की  चाय में  अक्सर  सरकार या इज़हार का चर्चा सा  रहता  है  

शतरंज के चौपाट के समान  सांझ दो रंगो को समायें हुए सा लगता है 

शतरंज  के चौंसठ  चौरस जैसा  सांझ भी कौटिल्य सा  लगता है  

 






















































































































रविवार, 12 अप्रैल 2020

                                                                           
                                                                             अलौकिक गाथा 


अलौकिक   भारत   की यह गाथा है,
सिंहासन के लिए जहाँ  संग्राम का आगाज़ हैं, 
रणभूमि कुरुक्षेत्र जिसमे हस्तिनापुर का लहू सुर्ख लाल हैं, 
पांडवो और  कौरवो  ने  जहाँ अधिक  खोया,कम  पाया हैं 11 

शांतनु से नीव पड़ी जिस युद्ध संग्राम की,
ना  देता  बिन  सोचे वह वचन सत्यवती  को  मोह में ,
तो शायद महाभारत का हर अध्याय  ही अलग होता, 
 भीष्म  पितामह   के सिर  हस्तिनापुर का मुकुट होता 11  

जहाँ राज्य मोह  से अधिक धृतराष्ट  का  पुत्र  मोह बलवान  हैं , 
जहाँ  दुर्योधन के  अभिमान का,कर्ण  के त्याग का,एकलव्य की गुरुभक्ति का,
अर्जुन के शौर्य का ,शकुनि के  छल  का  सबको भली भांति ज्ञान हैं , 
जहाँ लाक्षागृह्य के जलकर   भी ,विदुर  नीति   से पांडव पुत्र  कुशल लौट आये  थे,
 जहाँ गिरिधर की  लीलाएं हैं  , नारायण  से  सारथि बने वे  जहाँ 11 

जहाँ पांचाली का अपमान हैं,पांडवो का परिहास हैं ,
जहाँ भीष्म पितामह  का चिंतित करता मौन विराजमान हैं, 
जहाँ गांधारी शिव भक्तिन  के सौ पुत्रो का  विनाश हैं, 
टाला जा सकता था  महा संग्राम जहाँ ,
लेकिन उस युद्ध के इच्छुक  थे अनेक जहाँ 11 

यह  युद्ध संग्राम कहीं रुका नहीं ,
दिन पर दिन होता  गया युद्ध  और विकराल जहाँ  , 
संजय की दृष्टि से देखता धृतराष्ट  युद्ध जहाँ,
हैं धैर्य खोता, देखकर अपने वंश का अंत जहाँ,  
भीष्म पितामह पर पूरी महाभारत घूमती रहती हैं, 
हैं  अपनी प्रतिज्ञा  से विवश जहाँ , शंख  युद्ध का बजा  दिया 11 

यह ग्रन्थ सीखा गया कई, पाठ  जीवन के भी,
अधिक मोह मे आकर बिन सोचे शांतनु जैसे वचन न  दे जाना , 
हो अन्याय  पांचाली जैसा, तो भीष्म पितामह जैसे मूक -बधिर ना  बन जाना,
छल  कपट सिखलाने वाले शकुनि  बहुत मिलेंगे जीवन में,
उनके बहकावे में  कहीं  तुम, दुर्योधन ना  बन जाना 11 
mahabharat



रविवार, 7 अप्रैल 2019


                                                                              अनुभूति 

जीवन मार्ग पर शिथिल होकर मैंने,  राहों को कुछ खोजते हुए देखा हैं 1 
कुछ खोज रही प्रकृति को मैंने ,कुछ पाते हुए देखा हैं 11 

तेज़ हवाओ मे उड़ते पत्तों को  मैंने ,ठहरते हुए देखा हैं 1 
तेज़ी से भागती दुनियाँ में मैंने, कुछ लोगो को संतुष्ट  भी  देखा हैँ 11 

कुछ झूठे चेहरों मे  मैंने , सच्चे चेहरों को भी देखा है 1 
रंग - बिरंगे मेलों  मे मैंने ,शरबत में प्यार का रंग भरते लोगो को भी देखा हें 11 

चमकते  हुए  तारों  में  मैंने ,एक  तारे के टूटने  पर उदास होते आसमान  को देखा है 1 
धुप में  सुलगते राही  को मैंने ,पीपल की छाँव में सुकून से सोते हुए भी देखा है 11 

चुनाव के बाद नेताओ के वादों को मैंने ,खोखले होते हुए भी  देखा है 1 
जीवन के रंग-मंच में  मैंने ,लोगो को कई क़िरदार निभाते हुए देखा है 11 

इस  जीवन रूपी चक्र में मैंने ,  मेहनत और भाग्य  का सामंजस्य  भी  देखा है 1 
साथ ही मैंने ,अपने आप को लहर के समान  कभी तेज़ और मंद होते भी देखा हैँ 11 




मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

                                                 
                                                 जीवन  एवं शोध : अनूठा सम्बन्ध 


कभी जब मन प्रसन्न हो तो ,तब शब्दों  को सवारने को जी चाहता है ,   
और कभी मन जब खिन्न हो, तो उन्ही   शब्दों  में उलझने को जी चाहता है 11

एक शोधकर्ता की भांति काफी मन्गरत  कल्पनाएं कर लेती हूँ मैं ,
और उन्ही कल्पनाओं मे हर वक़्त दूसरी परिकल्पना  नकारने को  जी चाहता हैं 11  

कभी -कभी बिना किसी उदेशय के भी शोध करने को जी चाहता हैं ,
 और कभी इंसानो कि  आँखों मे दबी आवाज़ को पहचाने को जी चाहता है  11 

जो जीवन रुपी शोध  मात्र  ,उलझे हुए  उद्देश्य,परिकल्पनाओं ,
और बात साबित करने पर ही हो,  तो वह सत्य नहीं  महज  मिथ्या है 11  

अगर बात साबित हो जाये तो आप प्रशिष्टावान  ,
अगर तालिया न बजे तो आप बस बूत  समान 11 

ज़रूरी नहीं की महज़ चंद  आँकड़े ही आपके शोध का स्तर बताये ,
 उसी तरह ज़रूरी नहीं की जीवन की  सारी परिकल्पनाएं  हमारे  मुताबिक ही ढल जाये 11 

जीवन भी तो परिकल्पनाएं का सार हे जो शोध की भांति ,
 कुछ ढूंढ़ने और कुछ  पाने पर  ही ख़त्म हो जाता हे 11 

कुछ  लिखते -लिखते कभी  एकांत रहने  को जी चाहता हैं,  
और कभी एकांत मे भी शोर ढूंढने को जी चाहता हैं 11 

कभी जीवन रूपी शोध मे ,अपने और करीब आने को जी चाहता  हैँ,
और कभी इस जीवन रूपी शोध को ,एकांत मे यूँही बस  निहारने को जी चाहता  है  11  





शनिवार, 1 जुलाई 2017


बारिश  कि  बूंद 


इंतज़ार था जिसका वह आखिर आ ही गयी
कभी मंद ,कभी तेज़ सा था आगाज़ उसका 1  
वह थी  सहमी सी  ,धरती पर आकर 
पुकार रहा हैं इंसान, उसे  हाहाकार मचाकर11  

बारिश की वह बूंदे भी ,खूब  लम्बा सफर तय कर आई होंगी 
कहीं झमाझम बरसकर वह आगे बढ़ गयी होंगी 1 
फिर कहीं नन्हे बच्चे को गर्मी से बेहाल देख 
ममता लिए आँसुओ के रूप मे वही ठहर गयी होंगी 11 

धरती को सूखता देख ,उसका दिल भर  आता  होगा  
क़र्ज़  मे  डूबे किसानो की बेबसी भरी आँखे देख 
उसका दिल बैठ जाता होगा 11 

फिर झमाझम बरस पड़ती  होंगी वह
 किसी  सूखते पोखर की प्यास  बुझाने 1 
 शायद किसी को आत्महत्या से बचाने,
शायद किसी का परिवार बचाने   11 

जब महसूस करुँ  इन बूंदो को ,तो यह अंदर तक समां जाती हे 
जब ना करुँ  तो यह रेत की तरह फिसल जाती   हें 1 
कभी यह चुपचाप से आती हैं ,कभी यह   क्रोधित हो जाती हें 
किसानो के लिए यह त्यौहार बन जाती हें ,
और हमारे लिए सावन का आगाज़ बन  जाती हे 11 


काश ! यह बारिश मेरे आँगन  में ही ठहर जाये 
ताकि देख सकू और करीब से धान की उन फसलो को 1 
ताकि देख सकू और करीब से सुकून  भरे पशु -पक्षियो को 
जो  कबसे आस लगाए बैठे  थे  बादल के  बरसने का 11