जीवन एवं शोध : अनूठा सम्बन्ध
कभी जब मन प्रसन्न हो तो ,तब शब्दों को सवारने को जी चाहता है ,
और कभी मन जब खिन्न हो, तो उन्ही शब्दों में उलझने को जी चाहता है 11
एक शोधकर्ता की भांति काफी मन्गरत कल्पनाएं कर लेती हूँ मैं ,
एक शोधकर्ता की भांति काफी मन्गरत कल्पनाएं कर लेती हूँ मैं ,
और उन्ही कल्पनाओं मे हर वक़्त दूसरी परिकल्पना नकारने को जी चाहता हैं 11
कभी -कभी बिना किसी उदेशय के भी शोध करने को जी चाहता हैं ,
और कभी इंसानो कि आँखों मे दबी आवाज़ को पहचाने को जी चाहता है 11
जो जीवन रुपी शोध मात्र ,उलझे हुए उद्देश्य,परिकल्पनाओं ,
और बात साबित करने पर ही हो, तो वह सत्य नहीं महज मिथ्या है 11
अगर बात साबित हो जाये तो आप प्रशिष्टावान ,
अगर तालिया न बजे तो आप बस बूत समान 11
ज़रूरी नहीं की महज़ चंद आँकड़े ही आपके शोध का स्तर बताये ,
उसी तरह ज़रूरी नहीं की जीवन की सारी परिकल्पनाएं हमारे मुताबिक ही ढल जाये 11
जीवन भी तो परिकल्पनाएं का सार हे जो शोध की भांति ,
कुछ ढूंढ़ने और कुछ पाने पर ही ख़त्म हो जाता हे 11
कुछ लिखते -लिखते कभी एकांत रहने को जी चाहता हैं,
और कभी एकांत मे भी शोर ढूंढने को जी चाहता हैं 11
कभी जीवन रूपी शोध मे ,अपने और करीब आने को जी चाहता हैँ,
और कभी इस जीवन रूपी शोध को ,एकांत मे यूँही बस निहारने को जी चाहता है 11

अनूठा रिश्ता स्थापित किया है आपने जीवन और शोध के मध्य। बढिया। लिखते रहिये।
जवाब देंहटाएंDhanyawad
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