बारिश कि बूंद
इंतज़ार था जिसका वह आखिर आ ही गयी
कभी मंद ,कभी तेज़ सा था आगाज़ उसका 1
वह थी सहमी सी ,धरती पर आकर
पुकार रहा हैं इंसान, उसे हाहाकार मचाकर11
बारिश की वह बूंदे भी ,खूब लम्बा सफर तय कर आई होंगी
कहीं झमाझम बरसकर वह आगे बढ़ गयी होंगी 1
फिर कहीं नन्हे बच्चे को गर्मी से बेहाल देख
ममता लिए आँसुओ के रूप मे वही ठहर गयी होंगी 11
धरती को सूखता देख ,उसका दिल भर आता होगा
क़र्ज़ मे डूबे किसानो की बेबसी भरी आँखे देख
उसका दिल बैठ जाता होगा 11
फिर झमाझम बरस पड़ती होंगी वह
किसी सूखते पोखर की प्यास बुझाने 1
शायद किसी को आत्महत्या से बचाने,
शायद किसी का परिवार बचाने 11
जब महसूस करुँ इन बूंदो को ,तो यह अंदर तक समां जाती हे
जब ना करुँ तो यह रेत की तरह फिसल जाती हें 1
कभी यह चुपचाप से आती हैं ,कभी यह क्रोधित हो जाती हें
किसानो के लिए यह त्यौहार बन जाती हें ,
और हमारे लिए सावन का आगाज़ बन जाती हे 11
काश ! यह बारिश मेरे आँगन में ही ठहर जाये
ताकि देख सकू और करीब से धान की उन फसलो को 1
ताकि देख सकू और करीब से सुकून भरे पशु -पक्षियो को
जो कबसे आस लगाए बैठे थे बादल के बरसने का 11

Beautiful poetry. Keep it up dear .God bless!! :)
जवाब देंहटाएंबहुत खूब लिखा है मोहतरमा आपने । बारिश से जुड़े भावों को खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है।
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