शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016


"एक नन्हा चेहरा "



चलाते  -चलाते  स्कूटी का पहिया कहीं धंस गया,
सामने नज़र दौड़ाई तो एक नन्हे शक़्स को आते देखा 1 
चेहरे मे सनी धुल ,हाथ मे   एक कटोरा लिए अपने पास आते देखा 
ठण्ड से चेहरा फट चूका था ,खून भी कहीं जम  चूका था 1 
उसकी आँखे नम थी ,उसकी चित्त मौन थी 
मुझसे बोला"दीदी कुछ दें  दे तेरा भला होगा "11 


इस तेजी से भागती  हुई दुनिया मे ,दुआए भी बिन छुए ही निकल जाती हें 
सोचा ज़रा ठहर के ,नन्हे शक़्स की दुआएं ही बटोर ले 1 
तेज़ी से हाथो को बटुए की तरफ बढ़ाया ,पर नसीहतों का सैलाब सा आ गया 
नसीहते मिली हैं की "आदत मत बिगाड़ो इनकी ,आदत हो गयी हैं इनकी "
फिर देखा उसकी आँखों को ,लाचारी भरी थी उसमे 11 


कुछ खोज रही थी उसकी आँखे ,ताकि गुजर जाये एक दिन उसका 
अगर सरकार  की योजनाए हैं अनेक, तो क्यों दिखते  हैं यह मासूम सड़क मे 1 
संसद से सड़क तक आने में ,क्यों विफल हें योजना 
सर्व शिक्षा  अभियान तो हैं ,पर" सर्व " शब्द कहीं खो गया हैं 
समाज कहता हैं इनकी आदत मत बिगाड़ो ,तो समाज ही बता दे समाधान इसका11 


बटुआ आखिर  खुल  ही गया  ,उसका मौन चित्त जीवंत हो गया 1 
और उसके नन्हे हाथो के धकके से स्कूटी का धंसा  पहिया भी निकल गया 1 
पर कई सवाल मन में उमड़ पड़े ,उस नन्हे से शक़्स को देखकर 
मैं नहीं,परिवार नहीं ,समाज नही ,सरकार नहीं  ,तो कौन हैं इनका 1 
फिर कहते  हैं "आदत बन गयी हैं इनकी"11