पिता का "मौन प्यार "
उम्र बढ़ती गयी और मैं ज़यादा उन्हें पहचानने लगी ,
बचपन में जिसने परी के समान पाला मुझे ,
थोड़ी बड़ी हुई तो ,उसने साहसी बनना सिखाया मुझे ,
न कभी कोई दवाब डाला किसी चीज़े के लिए उसने
बस जीवन जीने के हुनर सिखाए उस पिता ने ,
बचपन में हर डाँट लगती थी बहुत बुरी मुझे ,
पर जैसे -जैसे बड़ी हुई तो ,तब जाना उसके प्यार को ,
उसका प्यार मौन जरूर ,पर दुआए हज़ार देता हैं
हैं वह सख्त जरूर बहार से ,पर अंदर से कोमल दिल उसका ,
मेरे भाविष्य कि चिन्ता मुझसे भी हे ज़यादा उसको ,
एक छोटी सी जीत में भी मेरी ,सबसे ज़यादा खुश होता वह ,
हर मुश्किल में साथ दिया ,उस पिता ने हमेशा मेरा
अब बड़ी हो गयी हूँ ,ओर गहराई से समझने लगी हूँ उनको ,
पर अब कहीं बूढ़े हो गए हें वे , शरीर ढलने लगा हें उनका ,
ये पंक्तियाँ शायद खुद मैं कभी न उन्हें कह पाऊँगी ,
क्यूंकि उनसे मैंने मौन प्यार का मतलब सिख लिया हैं 11
