शनिवार, 18 जून 2016

                                                          
   पिता  का "मौन  प्यार "   


उम्र  बढ़ती  गयी  और मैं ज़यादा  उन्हें  पहचानने  लगी ,
बचपन में जिसने परी के समान पाला मुझे ,
थोड़ी बड़ी हुई तो ,उसने  साहसी बनना सिखाया मुझे ,
न कभी कोई दवाब डाला किसी चीज़े के लिए उसने 


बस जीवन जीने के हुनर सिखाए उस पिता ने ,
बचपन में हर डाँट   लगती थी बहुत बुरी मुझे  ,
पर जैसे -जैसे बड़ी हुई तो ,तब जाना उसके प्यार को ,
उसका प्यार मौन जरूर ,पर दुआए  हज़ार देता हैं 


हैं  वह सख्त जरूर   बहार  से ,पर अंदर से कोमल  दिल उसका ,
मेरे भाविष्य  कि चिन्ता मुझसे भी हे ज़यादा उसको ,
एक छोटी सी जीत में भी मेरी ,सबसे ज़यादा खुश होता  वह ,
हर  मुश्किल में  साथ दिया ,उस  पिता  ने  हमेशा मेरा 



अब बड़ी  हो  गयी हूँ ,ओर  गहराई  से  समझने लगी हूँ उनको ,
पर अब कहीं बूढ़े  हो गए  हें वे , शरीर ढलने लगा हें  उनका ,
ये  पंक्तियाँ शायद खुद मैं कभी न  उन्हें  कह  पाऊँगी ,
क्यूंकि उनसे मैंने मौन प्यार का मतलब सिख  लिया हैं   11