KALPANAKRITI:
"एक नन्हा चेहरा "
चलाते -चलाते स्कूटी का पहिया...: "एक नन्हा चेहरा " चलाते -चलाते स्कूटी का पहिया कहीं धंस गया, सामने नज़र दौड़ाई तो एक नन्हे शक़्स को आते देखा 1 चेहरे...
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
गुरुवार, 8 दिसंबर 2016
"एक नन्हा चेहरा "
चलाते -चलाते स्कूटी का पहिया कहीं धंस गया,
सामने नज़र दौड़ाई तो एक नन्हे शक़्स को आते देखा 1
चेहरे मे सनी धुल ,हाथ मे एक कटोरा लिए अपने पास आते देखा
ठण्ड से चेहरा फट चूका था ,खून भी कहीं जम चूका था 1
उसकी आँखे नम थी ,उसकी चित्त मौन थी
मुझसे बोला"दीदी कुछ दें दे तेरा भला होगा "11
इस तेजी से भागती हुई दुनिया मे ,दुआए भी बिन छुए ही निकल जाती हें
सोचा ज़रा ठहर के ,नन्हे शक़्स की दुआएं ही बटोर ले 1
तेज़ी से हाथो को बटुए की तरफ बढ़ाया ,पर नसीहतों का सैलाब सा आ गया
नसीहते मिली हैं की "आदत मत बिगाड़ो इनकी ,आदत हो गयी हैं इनकी "
फिर देखा उसकी आँखों को ,लाचारी भरी थी उसमे 11
कुछ खोज रही थी उसकी आँखे ,ताकि गुजर जाये एक दिन उसका
अगर सरकार की योजनाए हैं अनेक, तो क्यों दिखते हैं यह मासूम सड़क मे 1
संसद से सड़क तक आने में ,क्यों विफल हें योजना
सर्व शिक्षा अभियान तो हैं ,पर" सर्व " शब्द कहीं खो गया हैं
समाज कहता हैं इनकी आदत मत बिगाड़ो ,तो समाज ही बता दे समाधान इसका11
बटुआ आखिर खुल ही गया ,उसका मौन चित्त जीवंत हो गया 1
और उसके नन्हे हाथो के धकके से स्कूटी का धंसा पहिया भी निकल गया 1
पर कई सवाल मन में उमड़ पड़े ,उस नन्हे से शक़्स को देखकर
मैं नहीं,परिवार नहीं ,समाज नही ,सरकार नहीं ,तो कौन हैं इनका 1
फिर कहते हैं "आदत बन गयी हैं इनकी"11
शनिवार, 18 जून 2016
पिता का "मौन प्यार "
उम्र बढ़ती गयी और मैं ज़यादा उन्हें पहचानने लगी ,
बचपन में जिसने परी के समान पाला मुझे ,
थोड़ी बड़ी हुई तो ,उसने साहसी बनना सिखाया मुझे ,
न कभी कोई दवाब डाला किसी चीज़े के लिए उसने
बस जीवन जीने के हुनर सिखाए उस पिता ने ,
बचपन में हर डाँट लगती थी बहुत बुरी मुझे ,
पर जैसे -जैसे बड़ी हुई तो ,तब जाना उसके प्यार को ,
उसका प्यार मौन जरूर ,पर दुआए हज़ार देता हैं
हैं वह सख्त जरूर बहार से ,पर अंदर से कोमल दिल उसका ,
मेरे भाविष्य कि चिन्ता मुझसे भी हे ज़यादा उसको ,
एक छोटी सी जीत में भी मेरी ,सबसे ज़यादा खुश होता वह ,
हर मुश्किल में साथ दिया ,उस पिता ने हमेशा मेरा
अब बड़ी हो गयी हूँ ,ओर गहराई से समझने लगी हूँ उनको ,
पर अब कहीं बूढ़े हो गए हें वे , शरीर ढलने लगा हें उनका ,
ये पंक्तियाँ शायद खुद मैं कभी न उन्हें कह पाऊँगी ,
क्यूंकि उनसे मैंने मौन प्यार का मतलब सिख लिया हैं 11
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