जंकशन पर गुजरता बचपन
मासूम सी सूरत इनकी ,खुला आसमान हैं जिनके लिए ,
ना पंखा ,ना बिजली,जो हैं प्रकृति की छाया पर निर्भर ,
जिन्होंने बचपन ना महसूस किया और गवा दी ,
अपनी पूरी ज़िन्दगी उस जंक्शन पर,
धूल मे सने ,हस्ते खेलते बच्चे वह ,
जिनके लिए पटरी ही हैँ खिलौना ,
सिक्को को उछालते ,पलटते ,
कभी कान लगाकर पटरी पर रेलगाड़ी की आवाज़े सुनते,
एक रोटी एक लिए भी लहूलुहान झरप होती ,
तब पता चलता हैं क्या कीमत हैं रोटी की ,
विरासत मैं जिन्हे , मिली महज गरीबी और लाचारी ,
सुबह से शुरू हो जाती जिनकी भीख मागने की शुरुवात ,
एक रोटी को भी बाटते वह, कड़कड़ाती ठण्ड मैं आसरा देखते वह ,
एक ही कम्बल पर रात बिताता पूरा परिवार ,
भारत भाग्य विधाता से गूँज उठता भारत कभी,
पर उन दुर्भागीयिओं ,का क्या जिनके लिए ,
भारत लाचारी,गरीबी,और पछतावा हैं,
क्या हैं गलती उनकी ,जो उनको मिल गया वैसा संसार ,
पैदा ही भूखे हुए और जिनकी मौत की भी खबर नहीं,
हम कहते हैं अपने आपको प्रतिषिथित नागरिक भारत के ,
कहते हैं नेता,बाल मजदूरी रोको,
पर खुद अपनी चाय का पहला प्याला ,बनवाते हैं उनसे ,
भारत मे हैं योज़नाओं का ताँता ,पर अमल ना कर सके हम इन्हे,
लालफीताशाही की भेट चढ़ जाती हैं ,यहाँ हर एक योजना ,
हम तो अपना भाग्य बनाते हैं ,पर कुछ का भाग्य तो पहले से ही निर्मित हैं,
बच्चो को गोद लेने की परम्परा सीख ली है हमने ,
पर क्यों न उन बच्चों की सूची मे उन बच्चो का भी नाम हो ,
आओ संवारे इन नन्हों को ,निकाले इन्हे पटरी से ,
आओ संवारे इन नन्हों को ,निकाले इन्हे पटरी से ,
और लेके आये इनका जीवन फिर पटरी पर 1
